ये कहानी उस महिला की है जो बाल विवाह जैसी कुरीति को खत्म करने निकली थी। नौ माह की मासूम का जीवन बचाने के लिए यह बेहद ताकतवर दबंगों से भिड़ गई। बदले में उसे इनाम नहीं बल्कि बहिष्कार, बदनामी और दरिंदगी का दर्द मिला। बावजूद इसके यह साहसी महिला डरी नहीं। इंसाफ के लिए अदालत पहुंची पर उसे न्याय नहीं, निराशा ही हाथ लगी। इसके बावजूद उसने देश की तमाम महिलाओं को इंसाफ दिलाने का बीड़ा उठाया और इसमें कामयाब भी हुई।
यह 33 साल से अपने लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रही राजस्थान की भंवरी देवी की कहानी है, जिनके साथ हुए भयावह गैंगरेप के 21 साल बाद सरकार ने कार्य-स्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून बनाया।
राजस्थान के दौसा जिले के भटेरी गांव में एक महिला थीं-भंवरी देवी। उम्र होगी करीब 31 साल। पति और चार बच्चे साथ रहते थे, घर-परिवार संभालती थी। जाति से कुम्हार भंवरी कभी मटके बनाती तो कभी गाय का दूध बेचकर घर का खर्च चलाती। साल 1985 में राजस्थान सरकार के महिला विकास कार्यक्रम में ‘साथिनी’ बनकर जुड़ी। भंवरी का काम था गांव में घर-घर जाकर लोगों में फैली सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए जागरूक करना। वो सरकारी काम को पूरी श्रद्धा और लगन से करती थीं।
लोगों के घर जाती महिलाओं को साफ-सफाई, परिवार नियोजन और लड़कियों को स्कूल भेजने के फायदों के बारे में बताती। राजस्थान में उस समय भ्रूण हत्या, दहेज और बाल विवाह जैसी कुरीतियां बहुत फैली हुई थीं। हजारों बच्चों को कमसिन उम्र में ही ब्याह दिया जाता था। कुछ लड़कियों को तो जन्म के कुछ महीने बाद ही ब्याह दिया जाता। लड़की जब तक अपने हाथ से खाना खाना भी नहीं सीख पाती थी, उससे पहले उसके हाथ पीले कर दिए जाते। भंवरी की अपनी शादी भी बहुत कम उम्र में हुई थी। शादी के वक्त वह मुश्किल से पांच या छह साल की रही होंगी और उनके पति आठ या नौ साल के होंगे।
भंवरी का काम सुनने में जितना आसान लग रहा है उतना था नहीं। भले ही भटेरी गांव राजस्थान की राजधानी जयपुर से मात्र 45 किलोमीटर ही दूर था। मगर यहां जातिवाद और भेदभाव बहुत ज्यादा था। गांव में मुश्किल से 1200 परिवार रहते होंगे। सबसे ज्यादा लोग दलित समुदाय के बैरवा जाति के थे। मगर गांव में गुर्जर और मीना समुदाय के लोग भी रहते थे, इनका काफी दबदबा भी चलता था। गांव में गिने-चुने कुम्हार समुदाय के परिवार भी रहते थे। भंवरी भी कुम्हार समुदाय से थी। गांव के बड़े परिवारों को यह पसंद नहीं था कि भंवरी उनके घर आकर महिलाओं को जानकारी दे या उनके परिवार के मामले में दखल दे। इसलिए वह पहले ही उसे टेढ़ी नजरों से देखते थे।
एक दिन कुछ ऐसा हुआ जो गांव के लोगों को बिलकुल नागवार हुआ। भंवरी को महिला विकास कार्यक्रम के सीनियर्स ने एक लिस्ट थमा दी, जिसमें 5 मई 1992 को अखा तीज के दिन गांव में बाल विवाह कराने वाले परिवारों के नाम लिखे थे। इनमें एक नाम उस गुर्जर परिवार का भी शामिल था जो अपनी 9 महीने की बच्ची का बाल विवाह कराने पर तुला था। भंवरी को मालूम था कि गूर्जरों के मामलों में उलझने का उलटा नतीजा हो सकता है। मगर भंवरी अपनी ड्यूटी पूरी करने के लिए उस घर पहुंची और पहले लोगों को समझाने की कोशिश कीं। मगर उसकी एक नहीं सुनी गई।
क्योंकि यह लिस्ट डीएम कार्यालय भी भेजी गई थी। इसलिए मौके पर लोकल पुलिस भी पहुंची। हालांकि, पुलिस ने भी ज्यादा सख्ती नहीं दिखाई। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि पुलिस उस घर में तो गई, मगर सिर्फ शादी का लड्डू खाकर वापस लौट गई। भंवरी इस बाल विवाह का विरोध करती रही। बवाल के बीच गुर्जर परिवार ने तय दिन पर शादी तो नहीं कराई मगर मौका मिलते ही अगले दिन रात 2 बजे उस नन्ही सी बच्ची का विवाह कर दिया। इतनी हिम्मत दिखाने के बाद भी भंवरी उस 9 माह की बच्ची का जीवन बर्बाद होने से नहीं रोक पाई।
बाल विवाह तो नहीं रुका मगर गुर्जर परिवार ने भंवरी का जीना दुश्वार कर दिया। भंवरी के घर का दाना-पानी बंद कर उसे गांव से बाहर निकालने का पूरा इंतजाम किया जाने लगा। गांव के लोगों से कहा कि कोई उसके बनाए हुए मिट्टी के घड़े नहीं खरीदेगा और न ही उससे दूध लेगा। भंवरी को बहुत आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ी। पति रिक्शा चलाता था, भंवरी का काम बंद हो गया, ऐसे में चार बच्चों को पालना उनके लिए मुश्किल था। मगर वह जैसे-तैसे अपनी गुजर बसर करने लगी।
भंवरी को इतना परेशान करने के बाद भी दबंगों के कलेजे में ठंडक नहीं पहुंची। उन्होंने शादी रुकवाने की इस घटना को अपनी नाक का सवाल बना लिया और भंवरी को सबक सिखाने के लिए अलग तरीका खोजा।
भंवरी के शब्दों में पढ़ें उस काले दिन का सच… साल 1992 को 22 सितंबर का दिन था। भंवरी अपने पति मोहन लाल प्रजापति के साथ खेत में पशुओं के लिए चारा काटने गई थी। इतने में गुर्जर समाज के ही पांच हट्टे-कट्टे लोग पहुंचे। पहले मोहन लाल को पकड़ा उसकी डंडे से बेरहमी से पिटाई की। उसके पूरे शरीर से खून बह रहा था। भंवरी कहती हैं “वो शाम का वक्त था, मैं और मेरे पति खेत में काम कर रहे थे। तभी उन लोगों ने डंडे से उन्हें पीटना शुरू कर दिया। वे पांच लोग थे।”
“मैं अपने पति के पास मदद के लिए दौड़ी। उन लोगों से रहम की मिन्नतें की, लेकिन उनमें से दो लोगों ने मेरे पति को बांध कर गिरा दिया। बाकी तीनों बलात्कार करने के लिए मेरी तरफ मुड़ गए।” पति के सामने भंवरी का सामूहिक बलात्कार किया गया। दोनों पति-पत्नी को बदहवास हालत में छोड़कर गुंडे वहां से चले गए। गुर्जर समाज के इन दबंगों ने गांव के लोगों को सबक देने के लिए भंवरी को जीवनभर का दर्द दिया था।
इतना सब होने के बाद भी भंवरी ने हिम्मत नहीं हारी, पति के साथ पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने पहुंची। मगर सिस्टम का मजाक तो देखिए उस पीड़िता की शिकायत लिखने को कोई तैयार ही नहीं हुआ। थाने में शिकायत कराने पर पुलिस ने उसका मजाक उड़ाया। शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया और तफ्तीश में लीपा-पोती कर दी। यहां तक की सबूत के तौर पर भंवरी से उसका लहंगा ( लॉन्ग स्कर्ट) जमा कराने को कहा गया। उसे पति के खून से सने साफे (पगड़ी) से खुद को ढंकना पड़ा। इसे पहनकर ही वह तीन किलोमीटर चलकर दूसरी साथिन के पास पहुंची।
आमतौर पर रेप की घटना के 24 घंटे के अंदर रेप पीड़िता की मेडिकल जांच कराई जाती है। मगर भंवरी की मेडिकल जांच भी 52 घंटे बाद की गई। बस्सी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंची तो केंद्र पर कोई महिला चिकित्सक न होने की बात कहकर उसे लौटा दिया गया। जयपुर के अस्पताल में रेफर किया तो वहां चिकित्सक ने मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच करने से इंकार कर दिया। अगले दिन मजिस्ट्रेट पर पहुंची तो काम के घंटे पूरे होने की बात कहकर आदेश देने से इंकार कर दिया।
जांच में शरीर की खरोंचों का कोई जिक्र नहीं किया गया। पीड़िता की शारीरिक परेशानी को शिकायतों को नजर-अंदाज कर रिपोर्ट बनाई गई। जिसका परिणाम यह निकला कि भंवरी को उसी के गांव के लोग ही झूठी बोलने लगे।
स्थानीय अखबारों ने भंवरी देवी की घटना को लिखना शुरू किया। उसे इंसाफ दिलाने के लिए राजस्थान में कई महिला कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए। बाद में मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपा गया।
1993 – सीबीआई ने मामले की जांच कर सितंबर में चार्जशीट फाइल की। दिसंबर में पांचों अपराधियों की जमानत अर्जी खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा, “मैं मानता हूं कि अभियुक्त रामकर्ण की नाबालिग बेटी की शादी को रोकने की कोशिश के कारण भंवरी देवी का गैंग रेप बदले की नीयत से किया गया था।”
1994 – अक्टूबर में पांचों अपराधियों को शोषण करने, हमला करने, साजिश रचने और गैंग रेप की धाराओं में केस दर्ज कर गिरफ्तार किया गया। उस समय तक यह उम्मीद थी कि भंवरी को जल्द ही इंसाफ मिलेगा। मगर यहीं से चीजें बिगड़ती चली गईं और केस की सुनवाई के दौरान ही बिना किसी कारण के पांच बार जज बदले गए।
1995 – नवंबर में इसी मामले में जयपुर ट्रायल कोर्ट ने ऑर्डर जारी कर पांचों अपराधियों को बरी कर दिया। उन्हें मामूली अपराधों में दोषी करार देते हुए महज 9 महीने की सजा मिली। वह जेल से छूट गए।
हैरान कर देने वाली बात यह है कि इस फैसले में कोर्ट ने जो दलील दी वह किसी महिला को इंसाफ दिलाने के नाम पर एक भद्दा मजाक था। निचली अदालत ने तर्क दिए कि-
गांव का प्रधान बलात्कार नहीं कर सकता
अलग-अलग जाति के पुरुष गैंग रेप में शामिल नहीं हो सकते
अगड़ी जाति का कोई पुरुष किसी पिछड़ी जाति की महिला से रेप नहीं कर सकता क्योंकि वह अशुद्ध होती है।
60-70 साल के बुजुर्ग बलात्कार नहीं कर सकते
एक पुरुष रिश्तेदार (चाचा-भतीजा) के सामने रेप नहीं कर सकता
भंवरी के पति चुपचाप खामोशी से पत्नी का रेप होते नहीं देख सकते थे
भंवरी देवी ने इस फैसले के खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट में अपील की। राज्य सरकार ने भंवरी देवी की मदद करने से ये कहते हुए इंकार कर दिया कि हमला उनके खेत में हुआ था और वे एक नियोक्ता के तौर पर इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
ट्रायल कोर्ट के फैसले का देशभर के कई महिला संगठनों ने विरोध किया। इसके खिलाफ आवाज उठाते हुए चार महिला संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट पिटीशन दायर की। जिसमें राजस्थान की विशाखा और महिला पुनर्वास समूह और दिल्ली के जगोरी और काली संस्था शामिल थे। इसे विशाखा नाम दिया गया।
दलील दी गई कि भंवरी देवी राजस्थान सरकार की कर्मचारी थीं, अपने कर्तव्यों का पालन कर रहीं थी। कार्यस्थल पर उन्हें हमले का सामना करना पड़ा, इस अपराध से निपटने के लिए कानून पर्याप्त नहीं है। भंवरी के मौलिक अधिकारों के हनन का मुद्दा उठा। संस्था ने मांग उठाई की कोर्ट को ऐसी गाइडलाइन जारी करनी चाहिए जिससे वर्कप्लेस पर महिलाओं के साथ हो रहे यौन शोषण को रोका जा सके। महिलाएं शिकायत कर सकें और सुनवाई हो।
1997 में भंवरी देवी की घटना के पांच साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने पीटीशन की सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक फैसला लिया। देशभर में महिलाओं की कार्यस्थल पर सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विशाखा गाइडलाइंस जारी की गई। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि वर्कप्लेस पर यौन शोषण की शिकार होने पर महिला के मौलिक अधिकार आर्टिकल 14, 15, 19 और 21 के तहत ‘राइट टू लाइफ’ और ‘राइट टू इक्वैलिटी’ पर सवाल खड़ा हुआ है। ऐसे शोषण के कारण महिलाओं को काम करने में परेशानी आती है और अक्सर काम छोड़ना पड़ता है।
पहली बार सेक्शुअल हैरेसमेंट की परिभाषा लिखी गई विशाखा गाइडलाइन में सरकारी हो या प्राइवेट सभी कंपनियों और संस्थाओं के लिए एक सेट ऑफ रूल तैयार किए गए। कंपनियों से कहा कि वह अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए काम करेंगी।1997 में ही पहली बार सुप्रीम कोर्ट द्वारा सेक्सुअल हैरेसमेंट की डेफिनेशन को स्पष्ट किया गया।
बनाए गए नियम
कंपनी को महिला के नाम पर आईपीसी की धारा के तहत पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करानी होगी। कई बार महिलाएं अपना नाम देने से परहेज करती हैं। सभी कानूनी मदद कंपनी द्वारा दी जाएगी।
कंपनी में एक शिकायत निवारण समिति बनाई जाएगी। जिसमें महिलाएं शिकायत लिखवा सकेगी। पहले कंपनी अपने स्तर पर घटना का आकलन करेगी फिर मामले को पुलिस थाने में दर्ज कराया जाएगा।
कंपनी में कर्मचारियों के लिए जागरुकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे।
सरकार की भूमिका पर कोर्ट ने कहा कि सरकार को इसके लिए कानून भी लाना होगा, जिसमें सजा का प्रावधान भी तय हो। आईपीसी के तहत यौन शोषण के लिए सजा तय की जाएं, ताकि इन गाइडलाइंस का पालन हो सके। पीड़िता को इंसाफ मिले और अपराधी को सजा।
21 साल बाद बना महिला सुरक्षा का कानून इन्हीं विशाखा गाइडलाइंस को देखते हुए संसद ने इसे कानून में बदला। साल 2013 में सेक्शुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस ( प्रीवेंशन, प्रोहिबिशन और रिड्रेसल) एक्स 2013 को लागू किया गया। इसमें बताया गया कि कंपनियों के अंदर कमेटी कैसे बनाई जाएगी। इसके लिए क्या तरीका अपनाया जाएगा, आगे शिकायतों का निवारण कैसे होगा। भंवरी देवी घटना के 21 साल बाद देश में कानून लागू हो सका, जिससे आज हर कामकाजी महिला को अपने दफ्तर में सुरक्षा कवच मिल रहा है।
भंवरी देवी के लिए इंसाफ अभी भी हकीकत से दूर है लेकिन उन्हीं की वजह से लाखों भारतीय महिलाओं को उनके दफ्तरों में यौन उत्पीड़न से कानूनी संरक्षण मिला हुआ है।
घटना के 33 साल बाद भी भंवरी इंसाफ मिलने का इंतजार कर रही हैं। इस लड़ाई में हमेशा उनका साथ देने वाले पति मोहन ने 2021 में अंतिम सांस ली। यही नहीं, जघन्य अपराध करने वाले 5 अपराधियों में से चार लोगों की भी मौत हो चुकी है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक और साहित्यकार हैं।)